Harendra pratap’s book Secularwad Aur Badalti Janganna Ke Aankde releases in Delhi
इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के कलानिधि विभाग द्वारा हरेन्द्र प्रताप की पुस्तक ‘सेकुलरवाद और बदलती जनगणना के आंकड़े’ के लोकार्पण और चर्चा सत्र का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने की। छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका मुख्य अतिथि, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आम्बेकर मुख्य वक्ता तथा पिछड़ा वर्ग उप-वर्गीकरण जांच आयोग के सदस्य डॉ. जतिंदर कुमार बजाज विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। धन्यवाद ज्ञापन आईजीएनसीए के कलानिधि प्रभाग के अध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार ने किया। लेखक हरेन्द्र प्रताप ने पुस्तक में उन्होंने मुख्य रूप से जनसंख्या के आंकड़ों को प्रस्तुत किया है।

छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका ने कहा कि देश में जनगणना और जनसंख्या संरचना को लेकर गंभीर विमर्श की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जाती रही है। उन्होंने पूर्वोत्तर भारत में हुए जनसांख्यिकीय बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि जनसंख्या में होने वाले परिवर्तन का व्यापक प्रभाव पड़ता है। उनके अनुसार, जनसांख्यिकीय बदलावों को समझने के लिए जनसंख्या के आंकड़ों का गंभीर अध्ययन आवश्यक है।कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए रामबहादुर राय ने कहा कि जनसंख्या से जुड़े विषयों पर केवल अनुमान या धारणाओं के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध आंकड़ों और तथ्यों के आधार पर गंभीर विमर्श होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनसंख्या संबंधी बदलावों से जुड़ी चुनौतियों की जानकारी भारत सरकार को है और इस दिशा में कार्य किया जा रहा है।
सुनील आंबेकर ने कहा कि असम आंदोलन ने देश के सामने जनसांख्यिकीय बदलावों से जुड़े सवालों को प्रमुखता से रखा था। उन्होंने कहा कि उस समय असम से उठी आवाज को केवल एक राज्य की समस्या के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ में समझने की आवश्यकता थी। उन्होंने भारतीय इतिहास के विभिन्न कालखंडों में जनसंख्या और सामाजिक संरचना में हुए बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि जनसांख्यिकी का प्रश्न देश की सामाजिक संरचना और अखंडता से जुड़ा हुआ विषय है। उन्होंने स्वतंत्रता से पहले और बाद की राजनीति में जनसंख्या संबंधी प्रश्नों पर हुए विमर्श का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा, देश की डेमोग्राफी देश की अखंडता से जुड़ा हुआ मुद्दा है।
डॉ. जतिंदर कुमार बजाज ने जनसंख्या के दीर्घकालिक आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि जनसांख्यिकीय परिवर्तन को केवल आंकड़ों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसके सामाजिक और सभ्यतागत आयामों पर भी विचार आवश्यक है। उन्होंने जनसंख्या वृद्धि, प्रजनन दर और विभिन्न समुदायों की जनसंख्या संरचना में आए बदलावों को समझने की आवश्यकता पर बल दिया। पुस्तक की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष राजीव तुली ने कहा कि पुस्तक में जनगणना के आंकड़ों के माध्यम से देश में जनसंख्या की बदलती संरचना और उसके सामाजिक प्रभावों पर चर्चा की गई है। उन्होंने कहा कि पुस्तक इस विषय को राष्ट्रीय संदर्भ में देखने का प्रयास करती है।
लेखक हरेन्द्र प्रताप बोले : पुस्तक में उन्होंने मुख्य रूप से जनसंख्या के आंकड़ों को प्रस्तुत किया है
लेखक हरेन्द्र प्रताप ने कहा कि पुस्तक में उन्होंने मुख्य रूप से जनसंख्या के आंकड़ों को प्रस्तुत किया है और इसे पांच खंडों में विभाजित किया गया है। उनके अनुसार, पुस्तक का उद्देश्य विभिन्न कालखंडों के जनसंख्या संबंधी आंकड़ों को सामने रखकर देश में हुए जनसांख्यिकीय परिवर्तनों को समझने का प्रयास करना है। उन्होंने असम और पश्चिम बंगाल सहित विभिन्न क्षेत्रों के जनसंख्या संबंधी बदलावों का उल्लेख करते हुए अपने विचार रखे। कार्यक्रम के अंत में प्रो. के. अनिल कुमार ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त किया।
जानिए क्या है हरेन्द्र प्रताप की पुस्तक ‘सेकुलरवाद और बदलती जनगणना के आंकड़े’ में
#BOOK: Secularwad Aur Badalti Janganna Ke Aankde: किसी भी स्थान की जनसंख्या उस स्थान की संस्कृति और सभ्यतागत पहचान की द्योतक होती है। भारत के संदर्भ में जनसंख्या की विविधता और विशालता उसे विशेषीकृत अध्ययन के योग्य बनाती है। साल 1947 में, जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, विभाजन की भयानक विभीषिका ने सबको यह विश्वास करने के लिए विवश कर दिया कि जहाँ भी मुसलमान बहुसंख्यक हो गए, अंततः उन स्थानों को भारत से अलग करने का निर्णय लेना पड़ा। प्रस्तुत पुस्तक जनसांख्यिकी के वर्तमान और भविष्य के संकटों को तथ्यों एवं आंकड़ों की सहायता से हमारे सम्मुख एक नग्न सत्य के समान बिखेर कर रख देती है। इस पुस्तक को व्यवस्थित तरीके से पाँच खंडों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक खण्ड एक चेतावनी के समान प्रतीत होता है। इन खंडों में भारत की जनसंख्या के आंकड़ों को दर्शाया गया है। वर्ष 1961 से 2011 तक हुई जनगणनाओं में चिंताजनक जनसांख्यिकी परिवर्तन देखने को मिले हैं। कई जिलों में, जिनके प्रखण्डवार आँकड़े प्रदत्त किए गए हैं, मुस्लिम जनसंख्या में अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिली है। इस वृद्धि में जन्म दर के साथ घुसपैठ के योगदान की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। प. बंगाल, असम, झारखंड, बिहार, ओडिशा तथा उत्तर प्रदेश इत्यादि राज्यों के कुछ जिलों में मुस्लिम जनसंख्या में तीव्र वृद्धिृ इस्लामिक गलियारे की आशंका को सत्य सिद्ध करने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान कर देती है। झारखंड के लगभग एक-चौथाई जिले ऐसे हैं जहाँ हिन्दू अल्पमत में आ गए हैं। हालांकि समस्या मात्र मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि से संबंधित नहीं है अपितु ईसाई जनसंख्या और मिशनरियों का बढ़ता प्रभाव भी भारत में जनसांख्यिकी परिवर्तन में नकारात्मक रूप से उत्तरदायी है। पूर्वोत्तर भारत समेत सभी जनजातीय इलाकों में ईसाई आक्रमण तीव्र हुआ है। खण्ड़ ‘ग’ स्पष्ट तौर पर यह बताता है कि किस प्रकार ईसाई भारत विभाजन की अपनी योजना पर कार्यरत हैं। अरुणाचल, नागालैंड, मणिपुर तथा मेघालय जैसे राज्यों में जहाँ अन्य समुदायों की संख्या में कमी आई है, वहीं ईसाई जनसंख्या में वृद्धि देखने को मिली है। जनगणना के इस संतुलन का सबसे वीभत्स परिणाम हुआ है, हिंदुओं का पलायन। प. बंगाल और महाराष्ट्र के अनेक इलाके, जम्मू और कश्मीर और हैदराबाद जीते-जागते उदाहरण हैं हिन्दू पलायन के, जहाँ मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ने के साथ ही हिंदुओं को अपने घर, व्यवसाय इत्यादि का त्याग करना पड़ गया। वहीं मिजोरम ईसाई बहुलता के कारण हिन्दू पलायन का चित्र प्रस्तुत करता है। हम जनसांख्यिकी लाभ की बात करते हैं और गर्व से कहते हैं कि भारत की जनसंख्या उसकी ताकत है लेकिन प्रस्तुत आँकड़े कुछ और कहानी ही कह रहे हैं। यह कहानी है एक ऐसे षड्यंत्र की जहाँ दो समुदाय सुनियोजित तरीके से अपनी जनसंख्या को बढ़ाने में लगे हुए हैं और हिन्दू, वह सिमटता जा रहा है, प्रखण्डवार, जिलावार और राज्यवार।
जानिए कौन हैं लेखक परिचय हरेन्द्र प्रताप

अंखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री रहे पूर्व विधान पार्षद श्री हरेंद्र प्रताप काफी अध्ययनशील राजनेता एवं प्रखर विचारक है।हरेंद्र प्रताप का नाम भी उन नेताओं में शामिल है, जिन्होंने संघ और भाजपा के साथ लंबे समय तक काम किया. हरेंद्र प्रताप संगठन महामंत्री रह चुके हैं और संघ के द्वारा ही हरेंद्र प्रताप को भाजपा में भेजा गया था. पार्टी में हरेंद्र प्रताप को विधान परिषद भेजा बाद में हरेंद्र प्रताप का राजनीति से मोहभंग हो गया।
1950में हरेन्द्र प्रताप का बिहार के बक्सर जिला के केसठ ग्राम में जन्म हुआ और अविवाहित हैं। पिता स्व. शिव बिलास पाण्डेय-स्वतंत्रता सेनानी। स्नातक तक पढ़ाई की है । ऐतिहासिक बिहार आंदोलन में 1974, 1975 एवं 1976 में गिरफ्तारी हुई । 1980 में बिहार में उर्दू को द्वितीय राजभाषा बनाये जाने का विरोध और गिरफ्तारी भी हुई । 1994 में लालू प्रसाद के जंगल राज का विरोध किया और गिरफ्तारी भी दी। 1999 में वाराणसी में काशी हिन्दू वि.वि. के कुलपति के खिलाफ आंदोलन और गिरफ्तार शिक्षा में संप्रदायिकता, गैट-तोड़ो, मोड़ो, छोड़ो पुस्तिका का लेखन। 2006 में “बिहार पर मंडराता खतरा” पुस्तक प्रकाशित। विभिन्न विषयों पर अखबारो में लेखन
दिल्ली : विशेष संवाददाता

