बिहार चुनाव : लालू -तेजस्वी यादव के भरोसे कांग्रेस का हाल – बेहाल, अस्तित्व के लिए कर रहा संघर्ष

congress struggle in bihar

दिल्ली /पटना : विशेष संवावदाता

Congress struggle in Bihar Continue: Tejashwi Yadav’s recognition and the Congress party’s standing are currently defined by their roles within the Mahagathbandhan, an opposition alliance facing internal challenges, and their performance in the upcoming 2025 Bihar Assembly elections.the Indian National Congress (INC) in Bihar continues to face significant challenges. Its struggles include navigating complex seat-sharing negotiations with its Mahagathbandhan (Grand Alliance) partners, facing a leadership deficit.

देश कि सबसे बड़ी दोनों पार्टी बीजेपी -कांग्रेस इस बार बिहार विधान सभा चुनाव में अकेले नहीं बल्कि महागठबंधन में शामिल होकर चुनाव लड़ रही है। बीजेपी -नीतीश के नेतृत्व में तो, महागठबंधन तेजस्वी यादव के सीएम फेस पर चुनाव लड़ रही है। बिहार में 1990 के बाद एक दफे लालू यादव और एक बार जद यू की पूर्ण बहुमत की सरकार बन सकी है। उसके बाद जो भी सरकार बनी, वो गठबंधन की रही है। 2005 के बाद नीतीश कुमार लगातार मुख्यमंत्रीहैं। बीच में दो बार राजद के साथ मिलकर सरकार चला चुके हैं। 1990 के बाद कांग्रेस मेन स्ट्रीम से बाहर हो गयी। लालू यादव के सत्ता आने के बाद कांग्रेस हाल – बेहाल हो गयी। पार्टी ने नेता कमजोर पड़ गए , जो थे वे लालू के कृपा पात्र से लेकर दरबारी बन गए। नतीजा कांग्रेस हाशिये पर चली गयी। अब भी कांग्रेस बिहार में अपने दम पर पुरे 243 विधान सभा पर चुनाव नहीं लड़ पा रही है।

बिहार विधान सभा चुनाव 2025 में कांग्रेस का हाल बेहाल है। बिहार में वर्तमान में कोई ऐसा नेता नहीं है , जिसके दम पर बिहार में कांग्रेस वोटरों तक पहुँच बना सके। वर्ष 1999 के बाद कांग्रेस बिहार में लालू अब तेजस्वी यादव का दरबारी बन बैठा है। पहले वैशाखी के सहारे थी , अब उनकी जगह दरबारी बन बैठा है। बिहार में चुनावी वर्ष में इस साल राहुल गांधी की ‘वोट अधिकार यात्रा’ के बाद लगा था कि कांग्रेस इस चुनाव में अपना दम दिखाएगी। राहुल ने बिहार प्रभारी के तौर पर युवा कृष्णा अल्लावरु को भेजा। अल्लावरु ने बिहार में लालू की दरबारी हो चुकी कांग्रेस को आत्मसम्मान देने की कोशिश भी की। लेकिन असफल हो गए। टिकट बेचने के आरोप में घिरे हैं।

बिहार विधान सभा चुनाव 2025 में कांग्रेस ने बिहार विधानसभा चुनावों के लिए 61 उम्मीदवारों को उतारा है। कांग्रेस को पिछली बार 2020 चुनाव में साझेदारी में 70 सीटें मिली थीं, जिनमें 19 सीटों पर उसने जीत हासिल की थी। महागठबंधन में शामिल कांग्रेस , इस बार के विधान सभा चुनाव में राजद नेता तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री का चेहरा पर चुनाव लड़ रही है।

बिहार कांग्रेस के प्रभारी (बाहरी नेता) ने कांग्रेस कि डुबाया लूटिया

बिहार कांग्रेस में जान फूंकने के लिए कांग्रेस समय – समय पर बिहार ने नए प्रभारी बनाते हैं। नए प्रभारी बिहार से बाहर के होते हैं , जिनको पार्टी कार्यकर्ताओं तक पहुँचने में कोई दिलचस्पी नहीं रहती है। ये प्रभारी अपना पी आर मजबूत करने में लगे रहता हैं। अब तक जो भी प्रभारी बने हैं , किसी का कार्यकाल में कांग्रेस मजबूत नहीं हो पाया है। हाँ इतना जरुर हुआ कि इसी बहाने नए प्रभारी लालू के सामने जी हजूरी करने, राहुल -सोनियाँ गाँधी के दरबार में पहुँच का दावा की राजनीति करने में सफल रहे।

2020 में गुजरात के नेता शक्ति सिंह गोहिल बिहार कांग्रेस के प्रभारी थे। लालू के कृपा पर रहे। विधान सभा चुनाव में सारी खराब सीटें कांग्रेस के पाले में डाल दी गई। नतीजा कुल 70 सीटों में मात्र 19 पर जीत हासिल हुई। महागठबंधन में कांग्रेस के फ्लॉप शो के कारण राजद के तेजस्वी यादव मुख्यम्नत्री बनते- बनते रह गए। शक्ति सिंह गोहिल के बाद ओडिशा के नेता भक्त चरण दास बिहार के प्रभारी बने। भक्त चरण दास भी लालू के चरण में नतमस्तक रहे। लालू प्रसाद यादव ने उन्हें भकचोन्हर (बेवकूफ) दास कह दिया। उसके बाद मोहन प्रकाश को कांग्रेस ने बिहार भेजा। मोहन प्रकाश ने भी लालू के सामने अपना सारा प्रकाश खो दिया। अब चुनावी वर्ष 2025 में दक्षिण भारत के नेट कृष्णा अल्लावरु भूल गए थे कि बिहार में लालू प्रसाद यादव के सामने ज़्यादा उड़ने पर ‘कतर’ दिए जाएंगे

लालू ने कांग्रेस के बिहार प्रभारी भक्तचरण दास को कहा था भकचोन्हर दास

2021 में बिहार में दो विधानसभा सीटों कुशेश्वरस्थान और तारापुर में उपचुनाव हुए थे। इस चुनाव में कांग्रेस -राजद के बीच रिस्ता टूट गया था। तब
कांग्रेस के बिहार प्रभारी भक्तचरण दास ने महागठबंन के टूटने की घोषणा की तो आरजेडी चीफ लालू प्रसाद यादव ने उन्हें भकचोन्हर दास तक कह दिया।

जानिए कांग्रेस और आरजेडी का यह रिश्ता है कितना पुराना

जब कांग्रेस के भीतर ही सोनिया गांधी को विदेशी मूल का बताकर शरद पवार सरीखे नेता अलग पार्टी बना चुके थे। उस वक्त लालू यादव ने सोनिया गांधी को देश की बहू बताया था। 2004 में जब केंद्र में यूपीए की सरकार बन रही थी तब भी लालू प्रसाद यादव चाहते थे कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनें। लेकिन सोनिया के मनाने पर लालू उस वक्त मनमोहन सिंह के चेहरे पर अपनी सहमति जता दी थी। अब बिहार में कांग्रेस कि 1990 से पहले और दूसरा 1990 के बाद की राजनीतिके बारे में बात करते हैं। 1951 में संयुक्त बिहार में पहला विधानसभा चुनाव हुआ था जिसमें कांग्रेस को 239 सीटें मिली थी। वहीं 1957 में कांग्रेस को 250 सीटें मिली थी। 1962 में 185 सीट, 1967 में 128 सीट, 1969 में 118 सीट, 1972 में 162 सीट, 1977 में कांग्रेस को केवल 57 सीट से संतोष करना पड़ा। 1980 में कांग्रेस 169 सीटों के साथ वापसी की। 1985 में कांग्रेस को 196 सीट और 1990 में कांग्रेस को 71 सीटें आईं।

लालू यादव का 1990 में उदय और हो गया कांग्रेस का पतन शुरू

वर्ष 1990 में बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव के उदय के साथ ही कांग्रेस का पतन शुरू हो गया। कुछ ही साल बाद कांग्रेस ने मजबूरी में लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक छाया में रहना कबूल कर लिया। इस दौर में जगरनाथ मिश्रा , राधानंदन झा , रघुनाथ झा , सरीखे नेता थे। सियासी जमीन बचाने के लिए कांग्रेस बिहार में लालू यादव की पिछलग्गू बनकर रह गई। वहीं लालू यादव ने बिहार में कांग्रेस की ऐसी जमीन जमीन खिसका दी कि वह अपने पैर पर उठने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रही है। लालू की छाया में आने के बाद कांग्रेस 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 29 सीटों पर सिमट गई। 2000 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस गठबंधन से अलग होकर 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारे लेकिन केवल 23 विधायक जीत पाए। जबकि इसी चुनाव में आरजेडी को 124 सीटें आई थी। 2005 में कांग्रेस और आरजेडी फिर से मिलकर लड़े, लेकिन चारा घोटाले में लालू यादव का नाम आने के चलते दोनों को नुकसान उठाना पड़ा। पहली बार बिहार में नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए की बहुमत वाली सरकार बनी। 2004-2009 तक चली मनोमहन सरकार में लालू यादव रेलमंत्री रहे। 2009-14 तक चली मनमोहन सिंह की दूसरी सरकार में लालू यादव को जगह नहीं मिली। 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू यादव ने कांग्रेस का हाथ झटककर रामविलास पासवान के साथ गठबंधन बनाया, लेकिन उन्हें करारी हार मिली। कांग्रेस 243 सीटों पर प्रत्याशी उतारकर 4 विधायक तो आरजेडी के 22 विधायक जीते। यह लालू यादव की राजनीतिक जीवन की सबसे बुरी हार रही। उनकी पार्टी बिहार विधानसभा में विपक्ष का दर्जा हासिल करने लायक सीटें भी नहीं जीत पाई।

आरजेडी क्यों कांग्रेस को लगाना चाहती है किनारे?

साल 2015 में जब नीतीश कुमार महागठबंधन में शामिल हुए तो यह राजद और कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित हुआ। राजद 80 सीटों के साथ नंबर वन पार्टी बनी और कांग्रेस के खाते में भी 27 सीटें आईं। 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस+आरजेडी+वाम दलों ने मिलकर गठबंधन में चुनाव लड़े। इस चुनाव में आरजेडी 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। वहीं महागठबंधन की सरकार नहीं बनने के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराया जाता है। क्योंकि चुनाव में कांग्रेस केवल 19 सीटें जीत पाई। 2019 के लोकसभा चुनाव में पीएम नरेंद्र मोदी और उनकी टीम कांग्रेस की नीतियों को लेकर आक्रामक रहे, जिसका नुकसान आरजेडी को भी हुआ। आरजेडी मानती है कि कांग्रेस की वजह से ही 2019 के लोकसभा चुनाव में उसके एक भी सांसद नहीं जीत पाए और एनडीए 39 सीटें जीतने में सफल रही। इसके अलावा 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी महागठबंधन की सरकार नहीं बनने के लिए कांग्रेस को ही जिम्मेवार माना जा रहा है।

बिहार के विनाश के लिए पिच कांग्रेस ने तैयार की थी ?

बिहार को विनाश में भेजने के लिए लालू-राबड़ी राज(1990 -2005) अलावे कांग्रेस भी जिम्मेबार रही है । यह और बात है कि लालू यादव कांग्रेस से आगे हो गए। 15 साल के शासन काल में लालू -राबड़ी ने भ्रस्टाचार -जातिवाद का ऐसा रूप सामने आया कि बिहार में जंगलराज देश भर में चर्चित हो गया था। आज भी बिहार चुनाव में यही जंगलराज वापस नहीं आने देने के लिए एनडीए गठबंधन , लालू के इमेज पर हमला कर रहे हैं। पी एम में अपने रैली में कहा कि बिहार में
कहा कि बिहार में जंगल राज की वापसी कोई नहीं चाहता है। लालटेन युग में कौन जाना चाहता है।

बिहार में कांग्रेस कि राजनीति का जाने इतिहास

बिहार का राजनीतिक इतिहास देखेंगे तो पाएंगे कि पहले मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिन्हा और 20 वें मुख्यमंत्री लालू यादव के बीच कोई भी मुख्यमंत्री अपना पूरा कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया था। 1961 और 1990 के बीच 18 मुख्यमंत्री हुए जिसमें कई मुख्यमंत्रियों के एक से अधिक कार्यकाल मिले। कुछ राजनेता 5 दिन, 13 दिन, 18 दिन, 51 दिन, 100 दिन, 163 दिन, 302 दिन आदि के लिए मुख्यमंत्री बने थे। मैं अपना उत्तर 1980 के दशक पर केंद्रित करूंगा। और 1990. यह वह दौर था जब कांग्रेस बिहार पर हावी थी और दो विधानसभा चुनाव जीती थी। 1970 के दशक तक बिहार अपेक्षाकृत बेहतर शासित राज्य था लेकिन 1980 के दशक में हालात बहुत बिगड़ गए।

बिहार ने उन 10 वर्षों (1980 -1990 ) में (जगन्नाथ मिश्र (दो बार), चंद्रशेखर सिंह, बिंदेश्वरी दुबे, भागवत झा आजाद, सत्येंद्र नारायण सिन्हा) में 6 मंत्रिमंडल देखा। यह कांग्रेस की हाई कमान संस्कृति का दौड़ था और इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी भारत भर में मुख्यमंत्री पद बांटा करते थे। इसी तरह की बातें बिहार में हुई और आज कोई मुख्यमंत्री तो कल कोई और मुख्यमंत्री। मुख्यमंत्री शासन पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय अपनी सरकार को बचाने में व्यस्त रहते थे। । बहुचर्चित चारा घोटाला कांग्रेस युग में शुरू हुआ था। कांग्रेस राज के दौरान, अवैध रूप से पशुपालन विभाग से कम-कम राशि निकाली जा रही थी (ताकि किसी को जल्दी पता न चले) और लालू राज के दौरान यह अवैध निकास राशि कई गुना बढ़ गई थी। पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव के साथ-साथ एक और पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा को चारा घोटाले से जुड़े मामलों में दोषी ठहराया गया था।

Jetline

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