भारत में जेलें घटी पर अंडरट्रायल कैदियों की भीड़ बढ़ती जा रही है : इंडिया जस्टिस रिपोर्ट

डॉ. निशा सिंह

इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2020 से खुलासा हुआ है कि भारत में कुल कैदियों से दो-तिहाई कैदी बिना दोष सिद्ध हुए ही कैद में हैं. इन कैदियों पर न्यायिक प्रक्रिया चल रही है, जिन्हें न्यायिक भाषा में विचाराधीन कैदी कहा जाता है. भारत की जेलों में बंद 69 प्रतिशत कैदी विचाराधीन हैं, मतलब भारत की जेलों में हर 10 में से 7 कैदी अंडरट्रायल हैं. ये वो कैदी हैं जिन्हें अदालत से सजा नहीं मिली है, लेकिन वो जेल में फैसले के इंतजार में बंद हैं. संभव है कि इनमें से कई कैदी बरी होकर बाहर आ जाएं, लेकिन धीमी, मंहगी और जटिल न्यायिक प्रक्रिया, संसाधनों की कमी के कारण इन्हें अपनी जिंदगी जेल में गुजारनी पड़ रही है. 

इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2020, जिसे हाल ही में टाटा ट्रस्ट ने कुछ अन्य संस्थानों के सहयोग से तैयार किया है, देश के अलग-अलग राज्यों की न्याय करने की क्षमता का आकलन करती है. यह रिपोर्ट चार श्रेणियों में सर्वे के आधार पर तैयार की गई है. ये श्रेणी हैं- पुलिस, न्यायपालिका, जेल और कानूनी मदद.

जेलों में कैदियों की भीड़

भारतीय जिलों में क्षमता से 19 फीसदी ज्यादा कैदी हैं. 2016 में जेल ऑक्युपेंसी रेट 114% थी, यानी 100 के जगह 114 कैदी रखे गए थे, जो 2019 में बढ़कर 119 फीसदी हो गई. इस रिपोर्ट से साफ होता है कि 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अंडर ट्रायल कैदियों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक है. 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में तो 5 साल से ज्यादा समय के विचाराधीन कैदियों की संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है. 2016 में जहां देश के जेलों में 4,33,003 कैदी थे, वहीं 2019 में ये संख्या बढ़कर 4,78,600 हो गई. अगर जेलों की संख्या को देखा जाए तो 2016 में देश में 1412 जेलें थीं जो अब कम होकर 1350 हो गई है. इससे जेलों में भीड़ और बढ़ी है.

भारत के जेलों में दिल्ली और यूपी की जेलें सबसे ज्यादा भीड़भाड़ वाली जेलें हैं. दिल्ली के जेलों में कैदियों की संख्या सबसे ज्यादा 175 फीसदी है यानी कि यहां की जेलों में 100 जगह 175 कैदियों को रखा जाता है. दिल्ली जैसे हालात उत्तर प्रदेश के जेलों में भी है, यहां 100 के जगह 168 कैदी रखे जाते हैं. यानी जेलों में 100 कैदियों के रहने की क्षमता है वहां 168 बंदी रहते हैं. देश के सेंट्रल जेलों में क्षमता के अनुपात में 124 फीसदी कैदी रहते हैं, जबकि जिला जेलों में 130 फीसदी आबादी.

भीड़ के कारण कैदियों को कई बीमारियां

क्षमता से अधिक कैदियों को जेल में रखे जाने के कारण कैदियों को अस्वास्थ्यकर वातावरण में रहना पड़ता है. कमरे और शौचालय में अधिक भीड़ हो जाती है, जिससे कई तरह के संक्रामक रोग की चपेट में ये कैदी आ जाते है. कैदियों में सामान्य आबादी की तुलना में HIV, यौन संक्रमित रोग, हेपाटाइटिस बी और सी का प्रसार 2 से 10 गुना अधिक देखा गया है. दिसंबर 2020 तक 18000 से अधिक कैदी और कर्मचारी इसकी चपेट में आए थे और इसका प्रमुख कारण जेलों में अधिक भीड़ है. 

जेल ही नहीं जेल कर्मचारियों की संख्या भी घटी

एक तरफ जेलों में भीड़ बढ़ती जा रही है तो दूसरी तरफ जेलों और जेल अधिकारियों और कर्मचारियों की घटती जा रही है. अधिकारी स्तर पर बात की जाए तो आधे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हरेक तीन में से एक पद खाली है. उत्तराखंड में स्थिति बेहद खराब है, यहां 75 प्रतिशत पद खाली है. देश में तेलंगाना राज्य की स्थिति सबसे अच्छी कही जा सकती है, यहां खाली पदों की संख्या 1 फीसदी से भी कम है. जबकि कर्मचारियों की बात करें तो 29 प्रतिशत पद खाली है. झारंखड की स्थिति चिंताजनक है, यहां 64 फीसदी पड़ खाली है.

दरअसल जेल कैदियों को उनके किए की सजा देने की जगह है, जहां से बेहतर वातावरण में रहकर कैदी अपने को सुधारकर समाज की मुख्यधारा में वापस लौट सकें, लेकिन इसके लिए जेलों की स्थिति में सुधार आवश्यक है.

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