दिल्ली :डॉ. निशा सिंह
चुनाव जब होता है, तो चर्चित हुआ मुद्दे वोटरों को प्रभावित करते हैं। जीत-हार का फैसला करने का अधिकार जनता के हाथ में होता है। अभी बिहार विधान सभा चुनाव में लालू-राबड़ी कार्यकाल के जंगलराज, नीतीश कुमार का सुशासन, एनडीए का पीएम मोदी का विकास मॉडल के साथ-साथ पलायन, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी का मुद्दा छाया हुआ है। एनडीए जंगलराज का डर दिखा रहा है, तो राजद ने एनडीए के 20 साल के शासन में बिहार को विकास से दूर जाने, कर्ज से दबा बिहार, बेरोजगारी, पलायन और सुशासन की जगह कुशासन होने को मुद्दा बनाया है।
इसके बीच प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने भ्रष्टाचार, पलायन और बच्चों के भविष्य बनाने के मुद्दे को अपना चुनावी एजेंडा बनाया है। इस बार मुकाबला एनडीए और महागंठबंधन (राजद-कांग्रेस- वी आई पी – लेफ्ट पार्टी) के बीच सीधा हो रहा है। जनसुराज पार्टी भी पहले बार वोटरों को रिझा रही है। हालाकिं इनके पास नेताओं का आभाव है फिर भी वोटरों के बीच पैठ बनाने में कामयाब हो चुकी है। वोट कितना मिलेगा, अभी कहना मुश्किल है। लेकिन इतना तय है कि जन सुराज पार्टी ने दोनों एनडीए और महागठबंधन को बैक फुट पर जरूर ला दिया है। लालू-राबड़ी ने बिहार में 15 वर्ष तक शासन किया और अब नीतीश कुमार 20 साल से सत्ता में हैं। यानि 35 साल बिहार की सत्ता लालू-नीतीश के हाथ में रहा है। इस बार नीतीश पर उम्र हावी है, सुशासन मॉडल कमजोर पर चुका है, अफसरशाही बेलगाम है, भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है, बेरोजगारी, पलायन से बिहार के लोग परेशान हैं, पार्टी के नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप से नीतीश घिरे हैं। तो क्या इस बार बिहार में नीतीश इरा ख़तम हो जायेगा ? अगर एनडीए गठबंधन जीत भी गया तो क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बन पायेंगे ? इंडिया शाइनिंग कैंपेन के बाबजूद 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी केंद्र से विदा हुए, जंगल राज मुद्दा पर 2005 में लालू राज का खत्म हुआ और अब क्या 2025 में नीतीश की बारी है ?
आपको बता दें कि 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने अपने कार्यकाल पूरा होने के पहले लोकसभा चुनाव कराया था। वाजपेयी की सरकार को भरोसा था कि वे अपने नए कैंपेन “इंडिया शाइनिंग” के दम पर चुनाव जीत लेंगे। लेकिन ऐसा हो नहीं सका। तब एनडीए गठबंधन को हार का सामना करना पड़ा और कांग्रेस नीत नया गठबंधन यूपीए ने केंद्र में सरकार बना ली और प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) दस राजनीतिक दलों का गठबंधन था। जिसकी स्थापना 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद हुई और अंत 2023 में हुआ। इस गठबंधन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सबसे ज्यादा सदस्यों वाली पार्टी रही।
1999 के बाद भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए और कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन की ही सरकार रही। यूपीए ने दो बार पांच साल का कार्यकाल पूरा किया और एनडीए (मोदी सरकार का कार्यकाल अभी) तीन बार पांच साल का कार्यकाल पूरा किया है। भारत की राजनीति में साल 1999 तक करीब दो दशक से ज्यादा समय में चार बड़े गठबंधन बने, लेकिन किसी ने भी एक बार भी पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया। हालांकि, साल 1999 के बाद भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए और कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन की ही सरकार रही।
1998 में फिर 13 दल एक साथ आए और भाजपा के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन बनाया। चुनाव में इन 13 दलों को 258 सीटों पर जीत मिली। एआईएडीएमके ने एनडीए को समर्थन दिया और सरकार बनी। अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री बनाया गया। लेकिन गठबंधन की यह सरकार भी केवल 13 महीने ही चल सकी। ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी और जयललिता की एआईएडीएमके ने समर्थन दे रखा था। लेकिन जयललिता के समर्थन वापस लेने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिर गई। इसके बाद 1999 में चुनाव हुए और एनडीए ने सरकार बनाई। इस सरकार ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। यह पहली बार था कि किसी गठबंधन ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। इसी समय छह महीने पहले वाजपाई सरकार ने लोकसभा चुनाव करवा दिया। लेकिन इस चुनाव में भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए की हार हो गयी और यूपीए गठबंधन की सरकार बन गयी।

