गोवा: विशेष संवाददाता
Chambal: Where gun is heritage and silence speaks louder than law.
The 56th International Film Festival of India (IFFI) in Goa.
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा आयोजित 56वां भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) गोवा में आयोजित किया जा रहा है।
भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव, गोवा के इंडियन पैनरोमा के गैर-फीचर फिल्म खंड में प्रदर्शित ‘चम्बल (NF)’ उस भू-भाग का सजीव दस्तावेज़ है, जहां इतिहास की परछाइयां आज भी वर्तमान के कंधों पर बैठकर चलती हैं। यह फिल्म चम्बल को केवल अपराध और डकैतों की भूमि के रूप में नहीं, बल्कि एक जटिल सामाजिक मनोविज्ञान के रूप में पढ़ती है, जहां बंदूक सिर्फ हथियार नहीं, बल्कि गौरव, प्रतिष्ठा और पुरुषार्थ की परिभाषा बन चुकी है। ये फिल्म IFFI में 23 नवंबर को प्रदर्शित होगी।
शिवपुरी, भिंड, मुरैना, दतिया, ग्वालियर और श्योपुर से गुजरती यह दृष्टि हमें उस समाज की गहराई तक ले जाती है, जहाँ शस्त्र पूजा, शादी-ब्याह में हर्षोल्लास के साथ की जाने वाली फायरिंग और चुनावी शक्ति-प्रदर्शन एक सांस्कृतिक परंपरा के रूप में स्वीकृत हो चुके हैं। यहां बंदूक सम्मान का प्रमाणपत्र है, — और उसका न होना सामाजिक दुर्बलता का संकेत।
अनहद मिश्रा की यह फिल्म भाषा किसी सनसनी का निर्माण नहीं करती, बल्कि यथार्थ को उसकी सम्पूर्णता में पकड़ती है। कैमरा चम्बल की मूक पीड़ा और गर्व के बीच एक पुल बनाता है, जहां सूखी धरती, कांटेदार झाड़ियां और क्षत-विक्षत अतीत एक साथ दृश्य रचते हैं। यह वही चम्बल है, जिसे साहित्य ने कभी भय के प्रतीक के रूप में रेखांकित किया और सिनेमा ने रोमांच के आवरण में प्रस्तुत किया, पर ‘चम्बल (NF)’ उसे सामाजिक आत्मस्वीकृति के दर्पण में दिखाती है।
फिल्म यह प्रश्न उठाती है कि आज के समय में, जब अपराध के स्वरूप बदल चुके हैं और हथियार सत्ता का फैशन बन चुके हैं, क्या चम्बल वास्तव में पीछे है या हम सब उसी मानसिकता की आधुनिक प्रतिकृतियां हैं? यहां परंपरा और अपराध के बीच की रेखा धुंधली नहीं, लगभग अदृश्य हो जाती है।
दृश्य संयोजन में एक अजीब सौंदर्य है, जो भयावह है, लेकिन सम्मोहक भी। संगीत का संयम, संपादन की गहराई और कचोटती चुप्पियां दर्शक को भीतर तक विचलित करती हैं। यह फिल्म आपको सहमने नहीं देती, सोचने पर मजबूर करती है, और शायद आत्मसमीक्षा का रास्ता खोलती है।
‘चम्बल (NF)’ हमारे समय का सामाजिक दस्तावेज़ है, जो बताता है कि जब परंपरा हिंसा बन जाए, तब इतिहास केवल स्मृति नहीं, चेतावनी बन जाता है।

